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Padhiye Gita | Raghuvir Sahay
Episode 566
पढ़िए गीता | रघुवीर सहाय
पढ़िए गीता
बनिए सीता
फिर इन सब में लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घर-बार बसाइए
होंय कैँटीली
आँखें गीली
लकड़ी सीली, तबियत ढील…
1 year, 11 months ago
Saathi | Kedarnath Agarwal
Episode 565
साथी | केदारनाथ अग्रवाल
झूठ नहीं सच होगा साथी।
गढ़ने को जो चाहे गढ़ ले
मढ़ने को जो चाहे मढ़ ले
शासन के सी रूप बदल ले
राम बना रावण सा चल ले
झूठ नहीं सच होगा…
1 year, 11 months ago
Milna Tha Itefaaq Bichadna Naseeb Tha | Anjum Rehbar
Episode 564
मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था | अंजुम रहबर
मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था
मैं उस को देखने को तरसती ही रह गई…
1 year, 11 months ago
Pooch Rahe Ho Kya Abhaav Hai | Shailendra
Episode 563
पूछ रहे हो क्या अभाव है | शैलेन्द्र
पूछ रहे हो क्या अभाव है
तन है केवल, प्राण कहाँ है ?
डूबा-डूबा सा अन्तर है
यह बिखरी-सी भाव लहर है,
अस्फुट मेरे स्वर हैं…
1 year, 11 months ago
Raakh | Arun Kamal
Episode 562
राख | अरुण कमल
शायद यह रुक जाता
सही साइत पर बोला गया शब्द
सही वक्त पर कन्धे पर रखा हाथ
सही समय किसी मोड़ पर इंतज़ार
शायद रुक जाती मौत
ओफ! बार बार लगता है म…
1 year, 11 months ago
Tumko Bhula Rahi Thi Ki Tum Yaad Aa Gaye | Anjum Rehbar
Episode 561
तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए | अंजुम रहबर
तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए
मैं ज़हर खा रही थी कि तुम याद आ गए
कल मेरी एक प्यारी सहेली किताब में
इ…
1 year, 11 months ago
Tumhari Jaati Kya Hai? | Kumar Ambuj
Episode 560
तुम्हारी जाति क्या है? | कुमार अंबुज
तुम्हारी जाति क्या है कुमार अंबुज?
तुम किस-किस के हाथ का खाना खा सकते हो
और पी सकते हो किसके हाथ का पानी
चुनाव में द…
1 year, 11 months ago
Ankur | Ibbar Rabbi
Episode 559
अँकुर | इब्बार रब्बी
अँकुर जब सिर उठाता है
ज़मीन की छत फोड़ गिराता है
वह जब अन्धेरे में अंगड़ाता है
मिट्टी का कलेजा फट जाता है
हरी छतरियों की तन जाती है क…
1 year, 11 months ago
Bachcha | Ramdarash Mishra
Episode 558
बच्चा | रामदरश मिश्रा
हम बच्चे से खेलते हैं।
हम बच्चे की आँखों में झाँकते हैं।
वह हमारी आँखों में झाँकता है
हमारी आँखों में
उसकी आँखों की मासूम परछाइयाँ …
1 year, 11 months ago
Pita | Vinay Kumar Singh
Episode 557
पिता | विनय कुमार सिंह
ख़ामोशी से सो रहे पिता की
फैली खुरदुरी हथेली को छूकर देखा
उन हथेलियों की रेखाएं लगभग अदृश्य हो चली थीं
फिर उन हथेलियों को देखते …
1 year, 11 months ago