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Chipche Doodh Se Nahlate Hain | Gulzar
Episode 870
चिपचे दूध से नहलाते हैं आँगन में खड़ा कर के तुम्हें | गुलज़ार
चिपचे दूध से नहलाते हैं आँगन में खड़ा कर के तुम्हें
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, न जाने क्या…
1 year, 1 month ago
Raat Kisi Ka Ghar Nahi | Rajesh Joshi
Episode 869
रात किसी का घर नहीं | राजेश जोशी
रात गए सड़कों पर अक्सर एक न एक आदमी ऐसा ज़रूर मिल जाता है
जो अपने घर का रास्ता भूल गया होता है
कभी-कभी कोई ऐसा भी होता …
1 year, 1 month ago
Chipe Raho Bheetar Hi | Nilesh Raghuvanshi
Episode 868
छिपे रहो भीतर ही | नीलेश रघुवंशी
फर्स्ट अप्रैल, शनिवार, 2000, आधी रात
कुछ-कुछ हो रहा है मुझे, शायद तुम अब आने वाले हो
सारी दुनिया के बच्चे, सबके सो जान…
1 year, 1 month ago
Dincharya | Shrikant Verma
Episode 867
दिनचर्या | श्रीकांत वर्मा
एक अदृश्य टाइपराइटर पर साफ़, सुथरे
काग़ज़-सा
चढ़ता हुआ दिन,
तेज़ी से छपते मकान,
घर, मनुष्य
और पूँछ हिला गली से बाहर आता
कोई कुत्ता…
1 year, 1 month ago
Badka Bhaiyya | Rupam Mishra
Episode 866
बड़का भइया | रूपम मिश्र
बड़का भइया मेरी मझिगवां वाली दीदी के चचेरे भाई हैं
उनकी पीढ़ी में सबसे बड़े और पट्टीदारी में सबसे मातिवर
दीदी की हर सुंदर बात…
1 year, 1 month ago
Pyaas | Ramdarash Mishra
Episode 865
प्यास | रामदरश मिश्र
खड़ा हूँ नदी के किनारे प्यासा-प्यासा
जल के पास होकर भी जल नहीं पी पा रहा हूँ
मैने पूछा-
"तुमने अपने पानी का यह क्या रूप बना दिया है…
1 year, 1 month ago
Daro | Ghanshyam Kumar Devansh
Episode 864
डरो | घनश्याम कुमार देवांश
डरो
लेकिन ईश्वर से नहीं
एक हारे हुए मनुष्य से
सूर्य से नहीं
आकाश की नदी में पड़े मृत चंद्रमा से
भारी व वज्र कठोर शब्दों से नहीं
उ…
1 year, 2 months ago
Jab Dost Ke Pita Marey | Kumar Ambuj
Episode 863
जब दोस्त के पिता मरे | कुमार अम्बुज
बारिश हो रही थी जब दोस्त के पिता मरे
भीगते हुए निकली शवयात्रा
बारिश की वजह से नहीं आए ज़्यादा लोग
जो कंधा दे रहे थे व…
1 year, 2 months ago
Itvaar | Anup Sethi
Episode 862
इतवार | अनूप सेठी
आओ इतवार मनाएँ
देर से उठें
चाय पिएँ
और चाय पिएँ
अख़बार को सिर्फ़ उलट पलट लें
हाथ न लगाएं
सिर्फ़ चाय का गिलास घुमाएँ
किसी को न बुलाएँ
नहाना भ…
1 year, 2 months ago
Jitne Sabhya Hotey Hain | Vinod Kumar Shukla
Episode 861
जितने सभ्य होते हैं | विनोद कुमार शुक्ल
जितने सभ्य होते हैं
उतने अस्वाभाविक।
आदिवासी जो स्वाभाविक हैं
उन्हें हमारी तरह सभ्य होना है
हमारी तरह अस्वाभाविक ।…
1 year, 2 months ago