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Badka Bhaiyya | Rupam Mishra
Description
बड़का भइया | रूपम मिश्र
बड़का भइया मेरी मझिगवां वाली दीदी के चचेरे भाई हैं
उनकी पीढ़ी में सबसे बड़े और पट्टीदारी में सबसे मातिवर
दीदी की हर सुंदर बात में बड़का भइया होते हैं
जैसे कोई व्यक्ति सुंदर है तो वो ज़रूर बड़का भइया की तरह भभकता है
संसार की सारी सौंदर्य उपमायें बड़का भइया के निहोरे पर बनी थी
जैसे बड़का भइया का रंग कैसा है एकदम गोर-अंगार
और आँखें आम की फांक
दुनिया की जितनी आदर्श और श्रेठता की कहानियां थी बड़का भइया से जुड़ती थीं
कोई प्राइमरी पढ़कर कलेक्टर हुआ तो वो ज़रूर बड़का भइया की प्रजाति का होगा ऐसा मेरी दीदी सोचती हैं
दीदी के घर तो बड़का भइया सिर्फ वरीक्षा में आये थे
पर दीदी की बातों में अक्सर आ जाते हैं
दीदी के जीवन की सबसे सुंदर यात्रा है जो छुटपन में बड़का भइया के कांधे पे गोपीगंज का मेला देखा
एकबार बीमार थे बड़का भइया जाने क्या हुआ था
बरिस बीते ठीक नहीं हो रहे थे
दीदी मेरे पास आकर भइया की चर्चा करके रोतीं
इतनी पवित्र व निःस्वार्थ रूलाई की मैं साथ में रो पड़ती उस अनदेखे आदमी के लिए
उसी रूलाई में मैंने सोचा कि पूछूँ कि दीदी आपको बड़का भइया का इतना मोह क्यों लगता है!
पर कभी न पूछ सकी ( इतने सजल स्नेह के लिए जैसे उलार लगता ये सवाल)
दीदी खूब प्रार्थना करतीं बड़का भइया के लिए और वे लम्बी बीमारी से ठीक हो गये हैं
और फिर से दीदी की बातों में नायक बने रहते हैं
मैंने बड़का भइया को नहीं देखा है
जैसा कि दीदी कहती हैं हमारे बड़का भइया अंधेरे में खड़े हो जायें तो अजोर हो जाये
मैं सोचती हूँ अजोर का बखार तो दीदी की आत्मा में है
अपनी दुनिया में खोए बड़का भइया को क्या याद है अपनी इस सखी बहन की
क्या उन्हें पता है इसी संसार में कोई स्त्री रहती है कहीं
धरती के एक कोने में हरियर माटी की तरह पड़ी
जो उनको इतना पवित्र प्रेम करती है।