Podcast Episodes
Back to Search
Maine Poocha Kya Kar Rahi Ho | Agyeya
Episode 665
मैंने पूछा क्या कर रही हो | अज्ञेय
मैंने पूछा
यह क्या बना रही हो?
उसने आँखों से कहा
धुआँ पोंछते हुए कहा-
मुझे क्या बनाना है! सब-कुछ
अपने आप बनता है।
मैने त…
1 year, 6 months ago
Gharaunda | Ekta Verma
Episode 664
घरौंदा | एकता वर्मा
धूल में नहाए शैतान बच्चे
खेल रहे हैं घरौंदा-घरौंदा।
जोड़ रहे हैं ईट के टुकडे, पत्थर, सीमेंट के गुटके
बना रहे हैं नन्हे-न्हे घर
हँस रह…
1 year, 6 months ago
Ek Bosa | Kaifi Azmi
Episode 663
एक बोसा | कैफ़ी आज़मी
जब भी चूम लेता हूँ उन हसीन आँखों को
सौ चराग अँधेरे में जगमगाने लगते हैं
फूल क्या शगूफे क्या चाँद क्या सितारे क्या
सब रकीब कदमों पर …
1 year, 6 months ago
Ghisi Pencil | Raghuvir Sahay
Episode 662
घिसी पेंसिल | रघुवीर सहाय
फिर रात आ रही है।
फिर वक्त आ रहा है।
जब नींद दुःख दिन को
संपूर्ण कर चलेंगे
एकांत उपस्थत हो, 'सोने चलो' कहेगा
क्या चीज़ दे रही है…
1 year, 6 months ago
Seekho | Shrinath Singh
Episode 661
सीखो | श्रीनाथ सिंह
फूलों से नित हँसना सीखो, भौंरों से नित गाना।
तरु की झुकी डालियों से नित, सीखो शीश झुकाना!
सीख हवा के झोकों से लो, हिलना, जगत हिलाना!…
1 year, 6 months ago
Apahij Vyatha | Dushyant Kumar
Episode 660
अपाहिज व्यथा | दुष्यंत कुमार
अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ,
तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ ।
ये दरवाज़ा खोलो तो खुलता नहीं है,
इसे तोड़ने का जतन कर रह…
1 year, 6 months ago
Dhool | Hemant Deolekar
Episode 659
धूल | हेमंत देवलेकर
धीरे-धीरे साथ छोड़ने लगते हैं लोग
तब उन बेसहारा और यतीम होती चीज़ों को
धूल अपनी पनाह में लेती है।
धूल से ज़्यादा करुण और कोई नहीं
संस…
1 year, 6 months ago
Donon Jahan Teri Mohabbat Me Haar Ke | Faiz Ahmed Faiz
Episode 658
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के
वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़…
1 year, 6 months ago
Berozgaar Hum | Shanti Suman
Episode 657
बेरोज़गार हम / शांति सुमन
पिता किसान अनपढ़ माँ
बेरोज़गार हैं हम
जाने राम कहाँ से होगी
घर की चिन्ता कम
आँगन की तुलसी-सी बढ़ती
घर में बहन कुमारी
आसमान में चिड…
1 year, 6 months ago
Tumse Milkar | Gaurav Tiwari
Episode 656
तुमसे मिलकर | गौरव तिवारी
नदी अकेली होती है,
पर उतनी नहीं
जितनी अकेली हो जाती है
सागर से मिलने के बाद।
धरा अत्यधिक अकेली होती है
क्षितिज पर,
क्योंकि वहाँ म…
1 year, 6 months ago