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Vah Mujhi Main Hai Bhay | Nandkishore Acharya
Episode 641
वह मुझी में है भय | नंदकिशोर आचार्य
एक अनन्त शून्य ही हो
यदि तुम
तो मुझे भय क्यों है ?
कुछ है ही नहीं जब
जिस पर जा गिरूँ
चूर-चूर हो छितर जाऊँ
उड़ जायें मेर…
1 year, 9 months ago
Ek Aadmi Do Pahadon Ko Kuhniyon Se Thelta | Shamsher Bahadur Singh
Episode 640
एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता | शमशेर बहादुर सिंह
एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता
पूरब से पच्छिम को एक क़दम से नापता
बढ़ रहा है
कितनी ऊ…
1 year, 9 months ago
Ma, Mozey Aur Khwab | Prashant Purohit
Episode 639
माँ, मोज़े, और ख़्वाब | प्रशांत पुरोहित
माँ के हाथों से बुने मोज़े
मैं अपने
पाँवों में पहनता हूँ, सिर पे रखता हूँ।
मेरे बचपन से कुछ बुनती आ रही है,
सब…
1 year, 9 months ago
Dukh | Madan Kashyap
Episode 638
दुख | मदन कश्यप
दुख इतना था उसके जीवन में कि प्यार में भी दुख ही था
उसकी आँखों में झाँका
दुख तालाब के जल की तरह ठहरा हुआ था
उसे बाँहों में कसा
पीठ पर दु…
1 year, 9 months ago
Bachpan Ki Wah Nadi | Nasira Sharma
Episode 637
बचपन की वह नदी | नासिरा शर्मा
बचपन की वह नदी
जो बहती थी मेरी नसों में
जाने कितनी बार
उतारा है मैंने उसे अक्षरों में
पढ़ने वाले करते हैं शिकायत
यह नदी कहा…
1 year, 9 months ago
Daily Passenger | Arun Kamal
Episode 636
डेली पैसेंजर | अरुण कमल
मैंने उसे कुछ भी तो नहीं दिया
इसे प्यार भी तो नहीं कहेंगे
एक धुँधले-से स्टेशन पर वह हमारे डब्बे में
चढ़ी
और भीड़ में खड़ी रही कुछ …
1 year, 9 months ago
Dehri | Geetu Garg
Episode 635
देहरी | गीतू गर्ग
बुढ़ा जाती है
मायके की
ढ्योडियॉं
अशक्त होती
मॉं के साथ..
अकेलेपन को
सीने की कसमसाहट में
भरने की आतुरता
निढाल आशंकाओं में
झूलती उतराती.…
1 year, 9 months ago
Pura Din | Gulzar
Episode 634
पूरा दिन | गुलज़ार
मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है,
झपट लेता है, अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की
आहट…
1 year, 9 months ago
Onth | Ashok Vajpeyi
Episode 633
ओंठ | अशोक वाजपेयी
तराशने में लगा होगा एक जन्मांतर
पर अभी-अभी उगी पत्तियों की तरह ताज़े हैं।
उन पर आयु की झीनी ओस हमेशा नम है
उसी रास्ते आती है हँसी
मुस्क…
1 year, 9 months ago
Saundarya Ka Aashcharyalok | Savita Singh
Episode 632
सौंदर्य का आश्चर्यलोक | सविता सिंह
बचपन में घंटों माँ को निहारा करती थी
मुझे वह बेहद सुंदर लगती थी
उसके हाथ कोमल गुलाबी फूलों की तरह थे
पाँव ख़रगोश के पा…
1 year, 9 months ago