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Prakriya | Kedarnath Singh
Description
प्रक्रिया । केदारनाथ सिंह
मैं जब हवा की तरह
दृश्यों के बीच से गुज़रता हुआ
अकेला होता हूँ
तो क्षण भर के लिए
मुझे कहीं भी देखा जा सकता है
किसी भी दिशा से
किसी भी मोड़ पर
किसी भी भाषा के अज्ञात
शब्दकोश में
पर मैं
जब कहीं नहीं होता
सिर्फ़ कहीं होने की लगातार कोशिश में
सामने की भीड़ को
दूर से पहचानता हुआ
हवा के आर-पार
एक प्रश्न उछालता हूँ
और हँसता हूँ
तो न जाने क्यों
मुझे लगता है
कि गूँज-हीन शब्दों के इस घने अंधकार में
मैं—
अर्थ-परिवर्तन की
एक अबूझ प्रक्रिया हूँ
जिसके भीतर
ये लोग
झाड़ियाँ
बत्तख़ें और भविष्य
हर चीज़ एक-दूसरे में
घुली-मिली है
जड़ें रोशनी में हैं
रोशनी गंध में,
गंध विचारों में
विचार स्मृतियों में,
स्मृतियाँ रंगों में...
और मैं चुपचाप
इस संपूर्ण व्यतिक्रम को
भीतर सँभाले हुए
चलते-चलते
झुककर
रास्ते की धूल से
एक शब्द उठाता हूँ
और पाता हूँ कि अरे
गुलाब!