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Ibn-e-Insha | Swanand Kirkire
Description
इब्ने इंशा । स्वानंद किरकिरे
हम इंशा जी के चेले हैं
हम जोगी हैं बैरागी हैं
हम प्रीत प्रेम के प्यासे हैं
हम फ़ितरत से अनुरागी हैं
इंशा की लय पर लिखते हैं
कुछ उनकी तरह ही दिखते हैं
इंशा की तरह हम प्रेमी हैं
इंशा की तरह हम बाग़ी हैं
है चाँद से अपना याराना
है मन उसका आना-जाना
जिस शै से हमारा दिल है लगा
वो चाँद-चाँद कहलाती है
हज़ारों रातें चाँद हज़ार
हर शब है मोहब्बत का बाज़ार
हम जीते हैं अजी ऐसे ही
हमें चाँद लगन जो लागी है
इस शब का चाँद तो आधा है
इसे कम कह दें या ज़्यादा है
इस चाँद के आगे पूनम है?
या आगे इसके अमासी है?
हम अंधी शब में जी लेंगे
हम मन में चाँद दरस लेंगे
हम इंशा जी के चेले हैं
हमें कविता गढ़नी आती है
इंशा जी, कविता जीवन है?
या जीवन कविता है, कह दो
ये जो भी है इसे जी लो जी...
जिसे जैसी समझ में आती है
बड़ा ध्यान लगा कर हमने सुनो
जीवन की कविता बाँची है
अपने घर नौ मन तेल है जी
अपने दर राधा नाची है।