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Sankatgrasth | Vivek Nirala
Episode 1159
Published 2 months ago
Description
संकटग्रस्त। विवेक निराला
भूमंडलीकरण के इस युग में
संकट ही संकट थे
स्थानीय लोग कुछ वैश्विक संकटों से जूझ रहे थे
और वैश्विक लोग स्थानीय संकटों से।
मेरा संकट मेरी टूटी खाट थी
जब कि मैं स्वप्न में था।
किसानों के पास कर्ज था और उद्योगपतियों के पास मर्ज
सरकार को किसी से हर्ज न था।
खुदगर्ज सिर्फ़ हिन्दी का कवि था लेकिन वह भी संकट से दुबराया था।
न उसकी किताब बिकती थी और न उसकी आत्मा।
उसके शरीर में जन्म से एक ही गुर्दा था
वह उसे भी नहीं बेच सकता था बस इसीलिए मुर्दा था।