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Parvat Pradesh Mein Pavas | Sumitranandan Pant

Parvat Pradesh Mein Pavas | Sumitranandan Pant

Episode 1146 Published 2 months, 1 week ago
Description

पर्वत प्रदेश में पावस । सुमित्रानंदन पंत


पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,

पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।


मेखलाकार पर्वत अपार

अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़,


अवलोक रहा है बार-बार

नीचे जल में निज महाकार,


- जिसके चरणों में पला ताल

दर्पण-सा फैला है विशाल!


गिरी का गौरव गाकर झर-झर

मद में नस-नस उत्तेजित कर


मोती की लड़ियों-से सुंदर

झरते हैं झाग भरे निर्झर!


गिरिवर के उर से उठ-उठ कर

उच्चाकांक्षाओं से तरुवर


है झाँक रहे नीरव नभ पर

अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।


उड़ गया,अचानक लो,भूधर

फड़का अपार पारद1 के पर!


रव-शेष रह गए हैं निर्झर!

है टूट पड़ा भू पर अंबर!


धँस गए धरा में सभय शाल!

उठ रहा धुआँ,जल गया ताल!

- यों जलद-यान में विचर-विचर

था इंद्र खेलता इंद्रजाल।


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