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Roop Naran Ke Tat Par | Rabindranath Tagore | Translation - Hans Kumar Tiwari
Episode 1133
Published 2 months, 3 weeks ago
Description
रूप-नारान के तट पर । रवींद्रनाथ टैगोर
अनुवाद : हंसकुमार तिवारी
रूप-नारान के तट पर
जाग उठा मैं।
जाना, यह जगत्
सपना नहीं है।
लहू के अक्षरों में लिखा
अपना रूप देखा;
प्रत्येक आघात
प्रत्येक वेदना में
अपने को पहचाना।
सत्य कठिन है
कठिन को मैंने प्यार किया—
वह कभी छलता नहीं।
मरने तक के दुःख का तप है यह जीवन -
सत्य के दारुण मूल्य को पाने के लिए
मृत्यु में सारा ऋण चुका देना।