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Suraj Doob Raha Hai | Kumar Divyanshu Shekhar
Description
सूरज डूब रहा है | कुमार दिव्यांशु शेखर
सूरज डूब रहा है
और मन भी।
गैयों के धूल उड़ाते खुर
स्मृतियों के ललाते आकाश पर
छींटते हैं
विस्मृतियों का धुँधलका।
कच्ची नींद से उठ
बैसाख की दोपहर
पूस की भोर में
सानी-पानी देते हाथ
घूम जाते हैं धुँधलकों के पीछे।
ललाती साँझ पर मिट्टी मलते
गैयों के झुंड।
जी चाहता है दो कदम तेज़ लपक
सट लूँ इनसे
दुलारूँ, गर्दन सहलाऊँ
पर मेरी बाहें छाती को चिपकी रहती हैं।
फट के बह न जाए ज्वालामुखी
इसलिए सीने को दबाकर बाँध दिया है इन्हें
बंधन ऐसा कि
नन्हें पिल्लों को दे सके बिस्कुट
इतना हिलना भी है मुश्किल।
सूरज डूब रहा है
डूब रही हैं आँखें-पनियायी आँखें
ट्रैक्टर-थ्रेशर के इंतज़ार में
आए तो फसल तैयार होकर पहुँचे घर को, और
पनियायी डूबी आँखें क्लासरूम में
ऊपर बोर्ड के बाईं ओर कोने में पाठदाता बनकर।
साँझ की ललाई को
धूमिल करते गैयों के खुर
आकाश के कैनवस पर धुआँ उड़ाते हैं।
धुएँ के पार छिटकी है चाँदनी
वह लड़का दस बरस का
अपनी ही तुकबंदियों पर नाचता है कैसे
अगली भोर की चिंताओं से बेखबर।
जी चाहता है दो कदम तेज़ लपक
पार हो जाऊँ धुएँ के
पर इतने भारी मन से धड़कता है दिल
कभी भी रुक सकता है
सो धीरे चलना है मुनासिब
गैयों के पीछे।
सूरज डूब रहा है
और मन भी।