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Mujhe Tez Dhar Wali Kavitayein Chahiye | Pratibha Katiyar
Description
मुझे तेज़ धार वाली कविताएँ चाहिए । प्रतिभा कटियार
मुझे तेज़ धार वाली कविताएँ चाहिए
जिनके किनारे से गुज़रते हुए लहूलुहान हो जाए जिस्म
जिन्हें हाथ लगाते ही रिसकर बहने लगे
सब कुछ सह लेने वाला सब्र
मुझे ढर्रे पर चलती ज़िंदगी के गाल पर
थप्पड़ की तरह लगने वाली कविताएँ चाहिए
कि देर तक सनसनाता रहे ढर्रे पर चलने वाला जीवन
और आख़िर बदलनी ही पड़े उसे अपनी चाल
मुझे बारूद सरीखी कविताएँ चाहिए
जो संसद में किसी बम की तरह फूटें
और चीरकर रख दें बहरी सरकारों के
कानों के परदे
मुझे बहुत तेज़ कविताएँ चाहिए
साँसों की रफ़्तार से भी तेज़
समय की गति से आगे की कविताएँ
जो हत्यारों के मंसूबों को बेधती कविताएँ
और हो चुकी हत्याओं के ख़िलाफ़
गवाह बनती कविताएँ
मुझे चाहिए कविताएँ जिनसे
ऑक्सीजन का काम लिया जा सके
जिन्हें घर से निकलते वक़्त
किसी सुरक्षा कवच की तरह पहना जा सके
जिनसे लोकतंत्र को
भीड़तंत्र होने से बचाया जा सके
मुझे चाहिए इतनी पवित्र कविताएँ
कि उनके आगे सजदा किया जा सके
रोया जा सके जी भर के
और सजदे से उठते हुए हल्का महसूस किया जा सके
मुझे चूल्हे की आग सी धधकती कविताएँ चाहिए
खेतों में बालियों सी लहलहाती कविताएँ चाहिए
मुझे मोहब्बत के नशे में डूबी कविताएँ चाहिए
और भोली गिलहरी सी फुदकती कविताएँ चाहिए
मुझे इस धरती पर
मनुष्यता की फ़सल उगाने वाली कविताएँ चाहिए।