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Ek Rajnitik Pralap | Kumar Ambuj

Ek Rajnitik Pralap | Kumar Ambuj

Episode 1020 Published 6 months, 2 weeks ago
Description

एक राजनीतिक प्रलाप।  कुमार अम्बुज 


यहाँ अब कुछ इच्छाओं का गुम हो जाना सबसे मामूली बात है।

मसलन धुएँ के घेरे के बाहर एक जगह

या एक ठहाका या एक किताब

कबाड़ में ऐसी कई चीज़ें हैं जिन पर जंग और मायूसी है

कबाड़ के बाहर भी ऐसी कई चीज़ें हैं जिन पर जम गई हैं उदासी की परतें

मूर्त यातना जैसा कुछ नहीं

बर्बरता एक वैधानिक कार्यवाही

जिसके ज़रिये निबटा जा रहा है फालतू जनता से

अखबार और हास्य धारावाहिकों के असंख्य चैनल हैं।

कंप्यूटर पर खेल हैं नानाविध

मेरे गाँव तक जाने का रास्ता बंद है अभी भी

वर्षों पुरानी निर्माणाधीन पुलिया की प्रतीक्षा में

उस पार करोड़ों लोग हैं जिनके जीवन से इधर कोई सरोकार नहीं

जो लोग दुर्घटनाओं में मरे उनकी लाशें अभी सड़कों पर हैं

शेर, शेर होने के जुर्म में मारे गए हैं।

और सियार, सियार होने की वजह से

निर्दोष मारे गए उस गली में जहाँ वे अल्पसंख्यक

यह एक बस्ती अभी-अभी उजड़ी है ज़हरीली शराब से

मेरी माँ के पैर में पिछले नौ बरस से फोड़ा है

हर गर्मी में फूट पड़ती है बेटे की नक़सीर

और उपाय मेरी पहुँच से दस हज़ार मील दूर हैं 

उधर एक कवि कूद जाता है तेरहवीं मंज़िल से


एक वह अलग था जिसे चौराहे पर पुलिस ने मार डाला था लाठियों से

फिर भी करोड़ों लोग हैं जो जीवित रहने के रास्ते पर हैं

मैं ख़ुद ज़हर नहीं खा पा रहा हूँ 

और ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि यह एक आशा है

कायरता है या साहस


इतनी ज़्यादा  मुश्किलें हैं जिनमें जीवित हैं लोग

करोड़ों लोग गरीबी के नर्क में हैं

करोड़ों बच्चे झुलस रहे हैं फैक्ट्रियों में

करोड़ों स्त्रियाँ जर्जर शोकमय शरीरों में मुस्करा रही हैं

अदृश्य सुखों की प्रतीक्षा में हाड़ तोड़ रहे हैं करोड़ों लोग

जो भी मुश्किलें हैं वे करोड़ों की गिनती में हैं

और नामुमकिन-सा ही है उनका बयान

अभाव और बीमारी-हज़ारों लोहकूटों द्वारा कूट दिए गए शब्द हैं

करोड़ों ऐसे फ़ैसले लिए गए हैं हमारे वास्ते जिनमें हम शामिल नहीं

लोग पसीज रहे हैं मगर दाँव पर कुछ नहीं लगा पा रहे

जिन्हे दुःखों को पार करना था वे अब रह रहे हैं दुःखों के ही साथ

अंत में मेरे पास फिर वही कुछ निराश शब्द बचे रहते हैं

चमक-दमक और रईसी के बीच चमकते हैं करोड़ों पैबंद

अनंत आश्वासनों के बीच मेरे पास कोई नारा नहीं है

न मैं मारो-काटो-बचाओं कह सकता हूँ 

मैं ही क्या करोड़ों लोग हैं जो इतनी आपाधापी में हैं

कि रोज़ी-रोटी के अलावा बमुश्किल ही कर सकते हैं

कोई और काम।


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