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Jeevan Ki Jai | Maithlisharan Gupt
Episode 986
Published 7 months, 3 weeks ago
Description
जीवन की जय। मैथिलीशरण गुप्त
मृषा मृत्यु का भय है,
जीवन की ही जय है।
जीवन ही जड़ जमा रहा है,
निज नव वैभव कमा रहा है,
पिता-पुत्र में समा रहा है,
यह आत्मा अक्षय है,
जीवन की ही जय है!
नया जन्म ही जग पाता है,
मरण मूढ़-सा रह जाता है,
एक बीज सौ उपजाता है,
स्रष्टा बड़ा सदय है,
जीवन की ही जय है।
जीवन पर सौ बार मरूँ मैं,
क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं,
यदि न उचित उपयोग करूँ मैं,
तो फिर महा प्रलय है,
जीवन की ही जय है।