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199. एक जड़ एक मूल

199. एक जड़ एक मूल

Published 5 months, 4 weeks ago
Description
श्रीकृष्ण कहते हैं, "जब वे विविध प्रकार के प्राणियों को एक ही परम शक्ति परमात्मा में स्थित देखते हैं और उन सबको उसी से जन्मा समझते हैं तब वे ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करते हैं" (13.31)। समसामयिक वैज्ञानिक समझ के अनुसार ब्रह्माण्ड लगभग 14 अरब वर्ष पूर्व एक बिन्दु से प्रारम्भ हुआ और आज भी विस्तारित हो रहा है। विस्तार की इस प्रक्रिया से बड़ी संख्या में तारे और ग्रह बने। इसने विभिन्न प्रकार के प्राणियों को भी जन्म दिया। यह श्लोक अपने समय की भाषा का प्रयोग करते हुए यही संदेश देता है। हालांकि यह ज्ञान आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, यह श्लोक वर्तमान क्षण में 'एक मूल' को देखने की क्षमता को इंगित करता है। हम विभिन्न जीवन रूपों और विभिन्न स्थितियों का सामना करते हैं जिसके परिणामस्वरूप हमारे भीतर कई भावनाएं पैदा होती हैं। जब हम 'एक मूल' का अनुभव करते हैं, तो हम 'मेरा और तुम्हारा' के विभाजन से मुक्त हो जाते हैं। इस श्लोक को मोक्ष की परिभाषा के रूप में भी लिया जा सकता है जो यहां और अभी परम स्वतंत्रता है। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, "परमात्मा अविनाशी है और इसका कोई आदि नहीं है और प्रकृति के गुणों से रहित है। यद्यपि यह शरीर में स्थित है किन्तु यह न तो कर्म करता है और न ही प्रकृति की शक्ति से दूषित होता है (13.32)। आकाश सबकुछ अपने में धारण कर लेता है। जिसे यह धारण किए रहता है उसमें लिप्त नहीं होता। इसी प्रकार से आत्मा शरीर में व्याप्त रहती है फिर भी आत्मा शरीर के धर्म से प्रभावित नहीं होती" (13.33)। ऐसी ही जटिलता को समझाने के लिए श्रीकृष्ण ने कमल के पत्ते का उदाहरण दिया जो पानी के संपर्क में रहने के बावजूद भीगता नहीं है। इसी प्रकार आत्मा भी शरीर के गुणों से प्रभावित नहीं होती। आकाश हमारे चारों ओर है और यह सब कुछ धारण करता है, लेकिन दूषित नहीं होता क्योंकि यह न तो किसी चीज से जुड़ता है और न ही किसी चीज से अपनी पहचान बनाता है। जब भी हम आकाश को देखते हैं तो इस पहलू को याद रखना आवश्यक है और कुछ ध्यान की तकनीकें इस पहलू का उपयोग करती हैं।
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