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Ve Sab Meri Hi Jaati Se Thin | Rupam Mishra

Ve Sab Meri Hi Jaati Se Thin | Rupam Mishra

Episode 916 Published 10 months ago
Description

वे सब मेरी ही जाति से थीं | रूपम मिश्र 


मुझे तुम ने समझाओ अपनी जाति को चीन्हना श्रीमान

बात हमारी है हमें भी कहने दो

ये जो कूद-कूद कर अपनी सहुलियत से मर्दवाद का बहकाऊ नारा लगाते हो

उसे अपने पास ही रखो तुम

बात सत्ता की करो

जिसने अपने गर्वीले और कटहे पैर से हमेशा मनुष्यता को कुचला है

जिसकी जरासन्धी भुजा कभी कटती भी है तो फिर से जुड़ जाती है

रामचरितमानस में शबरी-केवट-प्रसंग सुनती आजी सुबक उठतीं और

घुरहू चमार के डेहरी छूने पर तड़क कर सात पुश्तों को गाली देतीं

कोख और वीर्य की कोई जाति नहीं होती यह वे भी जानती थीं

जो पति की मोटरसाइकिल पर दौड़ती रहीं जौनपुर से बनारस तक

गर्भ में आई बेटी को मारने के लिए

जो घर के किसी मांगलिक कार्य में बैठने से इनकार कर देती हैं

बिना सोने का बड़का हार पहने, सब मेरी ही जाति से हैं

चकबन्दी के समय एक निरीह स्त्री का खित्ता हड़पने के लिए

जिसने अपनी बेटियों को कानूनगो के साथ सुलाया

जो रात भर बच्चे की दवाई की शीशी से बने

दीये के साथ साँकल चढ़ाए जलती रही

और थूकती रही इस लभजोर समाज पर

वह भी मेरी ही जाति से थी


जानते तो अप भी बहुत कुछ नहीं हैं महाराज!

हरवाह बुधई का लड़का जिसे हल का फार लगा

तो खौलता हुआ कडु  का तेल डाल दिया गया

उसका चीख कर बेहोश होना ज़मींदार के बेटों का मनोरंजन बना

बुधई का लड़का अब बड़ा हो गया है

और उसी परिवार के प्रधान बेटे की राइफल लेकर

भइया ज़िंदाबाद के नारे लगाता है

तो हाँफता समाजवाद वहीं सिर पकड़कर बैठ जाता है

मेरी लड़खड़ाती आवाज़ पर आप हँस सकते हैं

क्योंकि मेरी आत्मा की तलछट में कुछ आवाज़ें बची रह गई हैं

जो एक बच्ची से कहती थी कि तुम्हें किसी सखी-भौजाई ने बताया नहीं

कि रात में होंठों को दाँतों  से दबाकर

चीख कैसे रोकी जाती है जिससे कमरे से बाहर आवाज़ न जाए

हम जब ठोस मुद्दे को दर्ज करना चाहते हैं तो उसे भ्रमित करने के लिए सिर से

पैर तक सुविधा और विलास में लिथड़े जन जब कुलीनता का ताना देकर व्यर्थ की

बहस शुरू करते हैं तो मैं भी चीन्ह जाती हूँ विमर्श हड़पने की नीति

मुझे आपकी पहचानने की कला पर सविनय खेद है श्रीमान

क्योंकि एक आदमीपने को छोड़ आपने हर पन पहचान लिया

जो घृणा के विलास से मन को अछल-विछल करता है

रोम जला भर जानना काफ़ी कैसे हो सकता है

जब रमईपुरा और कुँजड़ान कैसे जले आप नहीं जानते

जहाँ समूची आदमीयत

सिर्फ़ घृणा-रसूख-नस्ल और जाति जैसे शब्दों पर खत्म हो जाती है

अपने कदमों की धमक पर इतराना तो ठीक है पर

बहुत मचक कर चलने पर धरती पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है

तम अपनी बनाई प्लास्टिक की गुड़ियों से अपना दरबार सजाओ महानुभाव

मन की कारा में आत्मा बहुत छटपटा रही है

मुझे अपनी कंकरही  ज़मीन को दर्ज करने दो

जो मेरे पंजों में रह-रह कर चुभ जाती है।

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