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Puri ka Samudra | Gyanendrapati

Puri ka Samudra | Gyanendrapati

Episode 829 Published 1 year ago
Description

पुरी का समुद्र | ज्ञानेन्द्रपति


आँखों में पुरी का समुद्र लिये जब लौटोगी

विस्मय -विस्फारित अपनी बड़री आँखों में

तरंग-विकल वह संयम-असमर्थ समुद्र

पछाड़ खाता, पुकारता, लीलने को आता

उद्द्वेलित, उद्दाम, हहाता


दष्टि-छोर तक फेला, फूला, फेनिल

टूट-टूट बिखर, तुम्हारे पैरों तले बिछ जाता

तुम्हें छोड़ जाता हुआ कुछ-कुछ गीला, कुछ-कुछ भीत

तुम्हारे कन्धों पर रख हाथ, तुम्हारी आँखों में झाँकता

मैं जानूँगा, अरे! यह तो मेरे मन का प्रतिबिम्ब है।

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