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Rajdhani | Vishwanath Prasad Tiwari
Description
राजधानी | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
इतना आतंक था मन पर
कि चौथाई तो मर चुका था
उतरने के पहले ही
राजधानी के प्लेटफॉर्म पर
मेरा महानगर प्रवेश
नववधू के गृह प्रवेश की तरह था
मगर साथियों के साथ
दौड़ते, लड़खड़ाते और धक्के खाते
सीख ही लिये मैंने भी सारे काट
लँगड़ी और धोबिया- पाट
एक से एक क़िस्से थे वहाँ
परियों और विजेताओं
आलिमों और शाइरों के
प्याले टकराते हुए
मैं भी बोलता था
सिकंदर और ग़ालिब के अंदाज़ में
हालाँकि प्याला ही भरता
और दस्तरख़्वान ही बिछाता रहा
शाही महफिलों में
दिन बीतते रहे
मेरी याददाश्त धुँधली होती रही
भूलता रहा
साकिन मौजा तप्पा परगना
फिर सूखने लगा पानी
जो था आँखों में और मन में
और झरने लगे भाव
एक-एक कर पीले पत्तों की तरह
शोर था इतना
कि करुणा भी पहिए-सी घरघराती
और शांति गुरगुराती इंजन-सी
इतनी भागमभाग
कि हास दिखता था
दूर से ही उदास निराश हताश
वीरता के लिए क्या जगह हो सकती थी
उस चक्रव्यूह में?
यदि प्रेम करता लड़कियों से
तो धोखा देता किन्हें?
इतनी रगड़ी गई चमड़ी
भीड़ में और बेरहम मौसम में
कि कोई अंतर नहीं रह गया
मेरे लिए आग और पानी में
इस तरह एक दिन
लौटा जब राजधानी से
तो मृतकाया में उतारा गया मैं
अपने गाँव के छोटे-से टीसन पर।