Episode Details

Back to Episodes
Aapke Liye | Ajay Durgyey

Aapke Liye | Ajay Durgyey

Episode 754 Published 1 year, 3 months ago
Description

आपके लिए | अजय दुर्ज्ञेय

आप यहां से जाइये!
आप जब मेरी कविताएँ सुनेंगे
तो ऐसा लगेगा कि जैसे
कोई दशरथ-मांझी पहाड़ पर
बजा रहा हो हथौडे
मैं जब बोलूंगा
तो आपको लगेगा कि
मैं आपके कपड़े उतार रहा हूँ और
न केवल उतार रहा हूँ बल्कि
उन्हीं कपड़ों से अपनी विजय पताका बना रहा हूँ
मैं जब अपने हक़ की कविता पढ़ंगा
तो आपको लगेगा कि
छीन रहा हूँ आपकी गद्दी,
छीन रहा हूँ आपका सिंहासन और इसी भय से
गलने लगेगीं आपकी हथेलियाँ, हड्डियाँ...
आप शर्म का बुत भी नहीं बन पायेंगे
मैं जब कविता पढूँगा तो
उसे सुनने के लिए आपको कोसेंगे आपके पुरखे
संभव है कि आपके बच्चे भी आपको गालियाँ दें और
आप रह जाओ बिल्कुल अकेले - एक आत्मस्वीकृति और
एक चुल्लू भर पानी के साथ। मैं जब कविता पढ़ँगा
तो आपको लगेगा कि आपके चुल्लू में आया वह पानी भी,
किसी और के श्रम का फल है। हॉँ! वह है-
बस आप समझने में विफल हैं।
और इसी बीच- कविताओं को सींच,
मैं जब रहूँगा मूक- तब भी आपको लगेगा कि जैसे
भरे दरबार, उतर गया है कोई शम्बूक-
जो चुप तो है मगर जिसकी आँखों में
तप है, प्रतिरोध है, अवज्ञा है। और जो बस यही पूछता है
कि वह कौन है? उसका अपराध क्या है? और मैं जब अपना अपराध पूछुँगा
तो आपको लगेगा कि आपके हाथों में पहना रहा हूँ हथकाड़ियाँ
और श्रीमान! सच तो यह है कि
आप यहाँ से जाइये या यहीं उपवास करिये या
नंगे बदन लेट जाइये या कुछ भी करिये - मगर अब,
जब तक यह जाति का पहाड़ रहेगा, किसी रूप में, एक इंच भी-
मेरा हथौड़ा नहीं रुकेगा।

Listen Now

Love PodBriefly?

If you like Podbriefly.com, please consider donating to support the ongoing development.

Support Us