Episode Details
Back to Episodes
169. दिव्य दृष्टि
Season 4
Episode 169
Published 1 year, 1 month ago
Description
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप (दिव्य स्वरूप) दिखलाया(11.9) और अर्जुन ने विश्वरूप में असंख्य मुख, असंख्य नेत्र, अनेक अद्भुत दृश्य, दिव्य आभूषणों और सुगंध धारण किये हुए, ऐसे अनेक चमत्कार देखे जो गौरवशाली और असीमित हैं (11.10 और 11.11)। उनकी चमक आकाश में एक साथ उगते हजारों सूर्यों के समान है (11.12)। अर्जुन ने संपूर्ण ब्रह्मांड को परमेश्वर के शरीर में देखा (11.13)। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान की क्योंकि वह विश्वरूप को अपनी आंखों से नहीं देख सकता था (11.8)। विश्वरूप में श्रीकृष्ण के असंख्य,गौरवशाली, बहुरंगी और बहुआकार वाले सैकड़ों और हजारों रूप (11.5); आदित्य, वसु और रुद्र; कई अद्भुत चीजें जो पहले कभी नहीं देखी गईं (11.6); चल और अचल समेत संपूर्ण ब्रह्माण्ड शामिल हैं (11.7)। दिव्य दृष्टि को समझने का एक आसान तरीका यह है कि इसे भगवान के द्वारा अर्जुन को एक विशेष शक्ति प्रदान करने के रूप में लिया जाए ताकि वह विश्वरूप को देख सके। गहरे स्तर पर, जब इंद्रियां इंद्रिय वस्तुओं से मिलती हैं तो हमारे अंदर सुख और दुःख की ध्रुवताएं उत्पन्न होती हैं (2.14) और इस कारण से 'हम दुनिया को वैसे नहीं देखते जैसी वह है, बल्कि हम उसे वैसे देखते हैं जैसे हम हैं'। दूसरा, हमारी इन्द्रियों और मस्तिष्क की क्षमताएं सीमित होती हैं, जो हमें दो भिन्न चीजों को उसी 'एक' (परमात्मा) के भागों के रूप में देखने से रोकती हैं। जिस प्रकार एक दृष्टिबाधित व्यक्ति प्रकाश या हमारे जीवन में प्रकाश के द्वारा लाई गई सुंदरता को समझ नहीं पाता है, उसी तरह इंद्रियों की ये सीमाएं हमें असीमित परमात्मा को समझने से रोकती हैं और इसीलिए दिव्यदृष्टि की आवश्यकता होती है। दिव्यदृष्टि और कुछ नहीं बल्कि वर्गीकरण का अंत है जहां चारों ओर एकता का आभास होता है; विभाजन का अंत है जहां दूसरों की खुशी हमारी खुशी होती है। दिव्यदृष्टि से अर्जुन ने परमेश्वर के शरीर में संपूर्ण ब्रह्मांड की एकता को देखा। निश्चित रूप से इस दृष्टि को प्राप्त करने के लिए परमात्मा के आशीर्वाद की आवश्यकता है, लेकिन ये आशीर्वाद हमारे प्रयास के परिणामस्वरूप मिलते हैं जैसे अर्जुन ने इसे प्राप्त किया।