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Achha Tha Agar Zakhm Na Bharte Koi Din Aur | Faraz

Achha Tha Agar Zakhm Na Bharte Koi Din Aur | Faraz

Episode 581 Published 1 year, 9 months ago
Description

अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और | फ़राज़


अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और

उस कू-ए-मलामत में गुज़रते कोई दिन और


रातों के तेरी यादों के खुर्शीद उभरते

आँखों में सितारे से उभरते कोई दिन और


हमने तुझे देखा तो किसी और को ना देखा

ए काश तेरे बाद गुज़रते कोई दिन और


राहत थी बहुत रंज में हम गमतलबों को

तुम और बिगड़ते तो संवरते कोई दिन और


गो तर्के-तअल्लुक था मगर जाँ पे बनी थी

मरते जो तुझे याद ना करते कोई दिन और


उस शहरे-तमन्ना से फ़राज़ आये ही क्यों थे

ये हाल अगर था तो ठहरते कोई दिन और


कू-ए-मलामत - ऐसी गली जहाँ व्यंग्य किया जाता हो

खुर्शीद - सूर्य
रंज - तकलीफ़, ग़मतलब- दुख पसन्द करने वाले

तर्के-तअल्लुक - रिश्ता टूटना( यहाँ संवाद हीनता से मतलब है)


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