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Baadal Raag | Awadhesh Kumar

Baadal Raag | Awadhesh Kumar

Episode 478 Published 2 years ago
Description

बादल राग | अवधेश कुमार


बादल इतने ठोस हों 

कि सिर पटकने को जी चाहे 

पर्वत कपास की तरह कोमल हों 


ताकि उन पर सिर टिका कर सो सकें 

झरने आँसुओं की तरह धाराप्रवाह हों 

कि उनके माध्यम से रो सकें 

धड़कनें इतनी लयबद्ध 

कि संगीत उनके पीछे-पीछे दौड़ा चला आए 

रास्ते इतने लंबे कि चलते ही चला जाए 

पृथ्वी इतनी छोटी कि गेंद बनाकर खेल सकें 

आकाश इतना विस्तीर्ण 

कि उड़ते ही चले जाएँ 

दुख इतने साहसी हों कि सुख में बदल सकें 

सुख इतने पारदर्शी हों 

कि दुनिया बदली हुई दिखाई दे 

इच्छाएँ मृत्यु के समान 

चेहरे हों ध्यानमग्न 

बादल इस तरह के परदे हों 

कि उनमें हम छुपे भी रहें 

और दिखाई भी दें 

मेरा हास्य ही मेरा रुदन हो 

उनके सपने और उनका व्यंग्य हो 

घोरतम तमस के सच में 

विजन में जन हों अपनेपन में 

सूप में धूप हो 

धूप में सब अपरूप हो 

बादल इतने डरे हों 

कि अपनी छाती पर 

मेरा सिर न टिकने दें 

झरने इतने धारा प्रवाह न हों 

कि मेरे आँसुओं को पछाड़ सकें। 


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