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Tedhi Kamar KI Auratein | Aishwarya Vijay Amrit Raj

Tedhi Kamar KI Auratein | Aishwarya Vijay Amrit Raj

Episode 346 Published 2 years, 4 months ago
Description

टेढ़ी कमर की औरतें | ऐश्वर्य विजय अमृत राज


छः-सात साल की लड़कियाँ

छोटे भाइयों/बड़े भाई के बच्चे के साथ/

सोलह साल की

सालभर पुरानी कन्याएँ

अपने बच्चे/जेठानी के बच्चे के साथ

चालीस-साठ की दादी/नानी

कमर एक तरफ निकालकर

बच्चे को लटकाए कुल्हे की हड्डी से, 

हो जाती हैं पेड़ के किसी टेढ़े तने सी तिरछी, 

और ठोंस, किसी पुरानी सभ्यता की मूर्ति सी,

जो टिकी-बची हो हर मौसम व समय की मार से।

कमर टेढ़ी किये ये औरतें धड़फड़ा कर चढ़ जाती हैं कई सीढ़ियाँ एक साथ

हल्के कदम से टहलत जाती हैं गाँव के एक छोर से दूसरे छोर तक,

झुककर उठा लेती हैं सारे बर्तन,

उचक कर चढ़ा देती हैं सबसे ऊपर की दराज़ पर मसाले के डिब्बे,

सरकस के सारे करतब निभा लेंगी ये औरतें, 

कमर से दो हाँथ जितने बड़े बच्चे लटकाये अपने शरीर से किसी भी दिन..

'कर्मा' की रात तेज़ी से लगाती हैं दुब घास से भरी बाल्टी के चक्कर

खाली पेट, गाते हुए भाइयों की सलामती के लिए माँ व गाँव की अन्य औरतों से सीखे हुए गीत,

मायके लौटी लड़कियाँ नाचती हैं शर्मीली सखी की बाँह खींचते हुए,

कहती हैं, "अब त अलगे साल अयते ई मौका"

गाते हुए गीत,

वे मन से भूल जातीं हैं वे सारे तिरस्कार जो मिलते हैं उसे औरत के शरीर में 'बहन' होने के कारण,

गीत जो करते हैं केवल भाईयों के गुणवान, उनके अस्तित्व की स्तुति,

उनकी धुन पर पिटती हैं चूड़ियाँ खनका-खनका तालियाँ…

साल भर की आज़ादी इस एक पल में जीते हुए

ससुराल लौटने का ख़्याल, छः बजते ही किबाड़ से अंदर हो जाने के नियम, 

सभी को डाल बाल्टी में

इस रात नाच लेना चाहती हैं कुछ मिनटों में इतना कि दुखे पैर अगली सुबह तक…

ताकि इस दर्द को हर दिन याद करें और खुश हो लें उसके पैर जब ससुराल में रखें जाएँ नाप-तौल कर।

दोपहर की धूप में जीप खड़ी कर ड्राइवर पसीने से लथपथ मन ही मन कोस रहा है औरतों की जमात को

लड़की धीरे धीरे बढ़ती है जीप की तरफ,

माँ बार-बार पोंछती है अपने आँसू

उसके बच्चों का मामा

कभी पुचकार कर

कभी आँखें दिखाकर

रख देता है जीप की सीट पर बैठे जीजा की गोद में बच्चे को,

पिता इशारे में कहता है लड़की को बन्द करने जीप का दरवाज़ा

गाड़ी स्टार्ट करते हुए ड्राइवर लेता है लम्बी साँस

गहरी सांस छोड़ती है ससुराल लौटती लड़की।

गाँव भर की औरतें जो खड़ी थीं गाड़ी को घेरे

हटने लगतीं हैं एक-एक कर

और कमर से अलग-अलग रिश्तों के बच्चे लटकाये

औरतें

औरतें लग जातीं हैं अपने अपने कामों में।

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