Episode Details

Back to Episodes
Vikshipt | Devansh Ekant

Vikshipt | Devansh Ekant

Episode 264 Published 2 years, 7 months ago
Description

विक्षिप्त | देवांश एकांत 


उनके पैदा होते ही

आदमी-औरत से माँ-पिता बने युगल की

कामनाओं को ज्वर आ गया

मेडिकल जाँच में ख़ारिज हुई उनकी परिपक्वता

और मुक्त कर दिया गया उन्हें आकांक्षाओं से

जैसे बहा दी गयीं हों अस्थियाँ गंगा में

धीरे से उन्हें पागल कहा गया

और तेज़ी से यह शब्द उनकी देह पर

रोया बन उगने लगा

उनमें से कुछ को हँसने का रोग था

वे ईश्वर का चुटकुला कहलाये

कुछ को दृश्यों के पीछे प्रेत दिखे

वे किसी तांत्रिक का परीक्षण बने

वे ताउम्र हँसते रहे, रोते रहे

यंत्रणाओं का शिकार होते रहे

अपनी देह के निशानों पर

रात-रात भर चकित रहे

कमरों के अंधेरों में

उजाले को टोहते रहे

इलेक्ट्रिक शॉक

हाई डोज़ की दवाइयों से

उनकी ऐंठी उँगलियों को देख

उनकी माताओं की आँखों में

मृत सपनों की काई जमा हो गयी

जिसपर एक पिता फिसलकर गिरता रहा

ख़ुद को सम्भालते हुए

अक्सर मज़ाक़ में

उनकी खोपड़ी पर मारी गयी टीप

भाग्य द्वारा चलायी गयी लाठी है

उन्हें उपेक्षित करके निकल जाना

उनकी बेसर-पैर बातों पर ऊब उठना

फूलों की हत्या है

उनका हवाओं से बातें करना

और उसपर किसी का दया दिखाना

घट रही कला को महसूस न कर पाने की असमर्थता है

मत बुलाना उन्हें पागल

मैं कहता हूँ कभी मत बुलाना !

किसी दूसरी दुनिया के संपर्क में डूबते उतराते

जाने कौनसी संरचना में फँसे हैं वो

उनके संग हँसना

उनपर मत हँसना

उनकी विषमताओं को समझना

खुद विषम मत बनना

उनकी काँपती हथेलियों से बने चित्र में

कोई पूर्णता ढूँढने से अधिक

जीवन में किए गए प्रयासों की

आवश्यक स्थिरता को तलाशना

और समझ जाना कि

चंद्रमा पर जो दाग़ है

वह उनकी पेंसिल से घिसा ग्रैफ़ाइट है

बग़ैर जिसके उस उपग्रह के छाया चित्र में

छाया सम्भव नही ।


Listen Now

Love PodBriefly?

If you like Podbriefly.com, please consider donating to support the ongoing development.

Support Us