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Meri Bansuri Meri Bhasha Hai | Shahanshah Alam

Meri Bansuri Meri Bhasha Hai | Shahanshah Alam

Episode 221 Published 2 years, 8 months ago
Description

मेरी बाँसुरी मेरी भाषा है | शहंशाह आलम | शहंशाह आलम


सुबह उठा तो देर शाम को घर पहुँचा सूरज

चाँद था कि रात भर जागा क़बीले में अथक


हम दिन भर शहरी हुए और रात को आदिवासी


यह मेरी भाषा की आवाज़ थी जो पहुँच रही थी

आदमी के झुंड में पूरी तरह साफ़ सुनी जाने वाली

इतनी साफ़ भाषा कि हम लड़ सकें अपने शत्रुओं से


मेरी भाषा मेरी बाँसुरी है और बाँसुरी मेरी आवाज़


इसी भाषा के सहारे बादलों पर चलता-फिरता हुआ

तुम तक पहुँचता रहा था पुराना परिचित बनकर


आम के पकने और शहद के मीठे होने वाले इन दिनों में 

उदासी कहाँ थी मेघ के चेहरे पर पिछले कई माह वाली


उदासी को तुम्हारे अलावा कौन अपना मान सकता है


सहस्र बार तुम्हारे घर गया पूर्णिमा वाला उदित मेरा चाँद

तुम्हारे कहने से ताकि तुम मुझे रोक लो यात्रा पर जाने से

और मैं जितना कविता में कह लेता था बुद्ध बनकर

तुम्हारे समक्ष कहाँ सुना पाता था कोई मार्मिक वृत्तांत

एक सच यह भी था कि हमने कितने-कितने जीवाश्म

इकट्ठा किए साथ रहकर उस टेढ़े-मेढ़े गुप्त सुरंग में


मेरा निरापद, सरल और प्राचीन प्रेम भी जीवाश्म ठहरा

अगर तुम मानते हो प्रेम को पूर्ण प्रेम भाषा को पूर्ण भाषा 


अगर तुम जकड़ लेते अपने आलिंगनपाश में बारिश वाली रात

मेरी बाँसुरी की आवाज़ को प्रेम की नई खोज स्वीकारते


अपनी सहस्र यात्राएँ पूरी कर लौट आता तुम्हारे समय के सच में।


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